अन्ना जी मतदाता को गाली मत दो! आप एक निश्कलंक व्यक्ति तक नहीं ढूँढ सके!!

Anna Hajare & Raj Thakre

अन्ना हजारे असली भारतीय नहीं, बल्कि असली मराठी माणुस!

Dr. Purushottam meena 'Nirankush'

Writer/लेखक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

यदि गलती से इस (लोकपाल) पद पर कोई भ्रष्ट, चालाक और मानसिक रूप से रुग्ण व्यक्ति आ गया तो..? इसलिये जन लोकपाल बिल का ड्राफ्ट बनाने वाली समिति को प्रस्तावित जन लोकपाल को नियन्त्रित करने की व्यवस्था भी, बिल में ही करनी चाहिये| इतिहास के पन्ने पटलकर देखें तो पायेंगे कि जब संविधान बनाया गया था तो किसने सोचा होगा कि पण्डित सुखराम, ए. राजा, मस्जिद ध्वंसक लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, संविधान निर्माता डॉ. अम्बेड़कर को गाली देने वाले अरुण शौरी जैसे लोग भी मन्त्री के रूप में संविधान की शपथ लेकर माननीय हो जायेंगे? जब सीवीसी अर्थात् मुख्य सतर्कता आयुक्त बनाया गया था तो किसी ने सोचा होगा कि इस पद पर एक दिन दागी थॉमस की भी नियुक्ति होगी? किसी ने सोचा होगा कि मुख्यमन्त्री के पद पर बैठकर नरेन्द्र मोदी गुजरात में कत्लेआम करायेंगे? जिससे पूरे संसार के समक्ष भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि तहस-नहस हो जायेगी? ऐसे हालातों में हमें हजारे जी कैसे विश्‍वास दिलायेंगे कि जितने भी व्यक्ति आगे चलकर प्रस्तावित जन लोकपाल के शक्ति-सम्पन्न पद पर बिराजमान होंगे, वे बिना पूर्वाग्रह के पूर्ण-सत्यनिष्ठा और ईमानदारी के साथ राष्ट्रहित में अपने कर्त्तव्यों का निर्वाह करेंगे|

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

राजनेताओं से निराश और अफसरशाही से त्रस्त भोले देशवासियों द्वारा बिना कुछ जाने समझे कथित गॉंधीवादी अन्ना हजारे के गीत गाये जा रहे हैं| गाये भी क्यों न जायें, जब मीडिया बार-बार कह रहा है कि एक अकेले अन्ना ने वह कर दिखाने का विश्‍वास दिलाया है, जिसे सभी दल मिलकर भी नहीं कर पाये| अर्थात् उन्होंने देश के लोगों में जन लोकपाल बिल पास करवाने की आशा जगाई है| मीडिया ने अन्ना हजारे का गीत इतना गया कि बाबा रामदेव की ही तरह हजारे के बारे में भी कुछ छुपी हुई बातें भी जनता के सामने आ गयी हैं| जिनके बारे में व्यावसायिक मीडिया से आम पाठक को जानकारी नहीं मिल पाती है| जबकि इन बातों को देश के लोगों को जानना जरूरी है| जिससे कि अन्ना के आन्दोलन में सहभागी बनने वालों को ज्ञात हो सके कि वे किसके साथ काम करने जा रहे हैं| कुछ बातें, जिन पर वैब-मीडिया ने काफी माथा-पच्ची की है :-

1. अन्ना हजारे असली भारतीय नहीं, बल्कि असली मराठी माणुस : मुम्बई में हिन्दीभाषी लोगों को जब बेरहमी से मार-मार कर महाराष्ट्र से बाहर खदेड़ा जा रहा था तो अन्ना हजारे ने इस असंवैधानिक और आपराधिक कुकृत्य का विरोध करने के बजाय राज ठाकरे को शाबासी दी और उसका समर्थन करके असली भारतीय नहीं, बल्कि असली मराठी माणुस होने का परिचय दिया| जानिये ऐसे हैं हमारे नये गॉंधीवादी अवतार!

2. अन्ना हजारे ने दो विवादस्पद पूर्व जजों के नाम सुझाये : जन्तर-मन्तर पर अनशन पर बैठते समय अन्ना हजारे ने कहा कि उनके प्रस्तावित जन लोकपाल बिल का ड्राफ्ट बनाने वाली समिति का अध्यक्ष किसी मन्त्री या किसी राजनैतिक पृष्ठभूमि के व्यक्ति को नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के किसी पूर्व जज को बनाया जायेगा| इस काम के लिये अन्ना हजारे ने दो पूर्व जजों के नाम भी सुझाये|

3. एक हैं-पूर्व चीफ जज जे. एस. वर्मा जो संसार की सबसे कुख्यात कम्पनी ‘‘कोका-कोला’’ के हितों के लिये काम करते हैं : दो पूर्व जजों में से एक हैं-पूर्व चीफ जज जे. एस. वर्मा, जिनके बारे में देश को लोगों को जानने का हक है कि आज जे. एस. वर्मा क्या कर रहे हैं? संसार की सबसे कुख्यात कम्पनी ‘‘कोका-कोला’’ को भ्रष्ट अफसरशाही एवं राजनेताओं के गठजोड़ के कारण भारत की पवित्र नदियों को जहरीला बनाने और कृषि-भूमि में जहरीले कैमीकल छोड़कर उन्हें बंजर बनाने की पूरी छूट मिली हुई है| जिसे देश की सबसे बड़ी अदालत ने भी सही ठहरा दिया है| ये कैसे सम्भव हुआ होगा, इसे आसानी से समझा जा सकता है| ऐसी खतरनाक कम्पनी को देश से बाहर निकालने हेतु देशभर में राष्ट्रभक्तों द्वारा वर्षों से जनान्दोलन चलाया जा रहा है| इस आन्दोलन को कुचलने और इसे तहस-नहस करने के लिये कम्पनी ने अपार धन-सम्पदा से सम्पन्न एक ‘‘कोका-कोला फाउण्डेशन’’ बनाया है, जिसके प्रमुख सदस्य हैं पूर्व चीफ जज जे. एस. वर्मा| इसके अलावा सारे संसार को यह भी पता है कि कोका कोला कम्पनी साम्राज्यवादी देशों के हितों के लिये लगातार काम करती रही है| ऐसी कम्पनी के हितों की रक्षा के लिये काम करते हैं, इस देश के पूर्व चीफ जज-जे. एस वर्मा| जिन्हें अन्ना हजारे बिल ड्राफ्ट करने वाली समिति का अध्यक्ष बनाना चाहते थे| देश का सौभाग्य कि बना नहीं सके|

4. दूसरे पूर्व जज हैं-एन. सन्तोष हेगड़े जो संविधान की मूल अवधारणा सामाजिक न्याय के विरुद्ध जाकर शोषित एवं दमित वर्ग अर्थात्-दलित, आदिवासी और पिछड़ों के विरुद्ध निर्णय देने से नहीं हिचकिचाये : अन्ना हजारे द्वारा सुझाये गये दूसरे पूर्व जज हैं-एन. सन्तोष हेगड़े| जो सुप्रीम कोर्ट के जज रहते संविधान की मूल अवधारणा सामाजिक न्याय के विरुद्ध जाकर आरक्षण के विरोध में फैसला देने के लिये चर्चित रह चुके हैं| जो व्यक्ति देश की सबसे बड़ी अदालत की कुर्सी पर बैठकर भी मूल निवासियों को इंसाफ नहीं दे सका हो, जो अपने जातिगत पूर्वाग्रहों को नहीं त्याग सका हो और हजारों वर्षों से शोषित एवं दमित वर्ग अर्थात्-दलित, आदिवासी और पिछड़ों के विरुद्ध (जिनकी आबादी देश की कुल आबादी का 85 प्रतिशत है) निर्णय देने से नहीं हिचकिचाया हो, उसे अन्ना हजारे जी जन लोकपाल बिल का ड्राफ्ट बनाने वाली समिति का चैयरमैन बनाना चाहते थे| देश का सौभाग्य कि बना नहीं सके|

5. वकालती हुनर के जरिये बीस करोड़ सम्पत्ति एक लाख में ले लेने वाले शान्तिभूषण को बनाया सह अध्यक्ष : उक्त दोनों जजों की सारी असलियत अनशन के दौरान ही जनता के सामने आ गयी, तो अन्ना हजारे वित्तमन्त्री प्रणव मुखर्जी को अध्यक्ष एवं अपनी ओर से सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता शान्तिभूषण को सह-अध्यक्ष बनाने पर सहमत हो गये, जो 1977 में बनी पहली गैर-कॉंग्रेसी सरकार में मन्त्री रह चुके है| हजारे की ओर से समिति के सह अध्यक्ष बने शान्तिभूषण एवं उनके पुत्र प्रशान्त भूषण (दोनों जन लोकपाल का ड्राफ्ट बनाने वाली समिति में हैं) ने 2010 में अपने वकालती हुनर के जरिये इलाहाबाद शहर में बीस करोड़ से अधिक बाजार मूल्य की अचल सम्पत्ति एवं मकान मात्र एक लाख में ले ली और स्टाम्प शुल्क भी नहीं चुकाया|

6. शान्तिभूषण एवं नियुक्त सदस्यों की सत्सनिष्ठा, देशभक्ति एवं देश के संविधान के प्रति निष्ठा के बारे में अन्ना हजारे को कैसे विश्‍वास हुआ : इससे अन्ना हजारे की राजनैतिक एवं भ्रष्ट व्यक्ति को समिति का अध्यक्ष नहीं बनाने वाली बात की असलियत जनता के सामने आ चुकी है| भूषण पिता-पुत्र सहित हजारे की ओर से नियुक्त अन्य सदस्यों की सत्सनिष्ठा, देशभक्ति एवं देश के संविधान के प्रति निष्ठा के बारे में अन्ना हजारे को कैसे विश्‍वास हुआ, यह आज तक देश को अन्ना हजारे ने नहीं बताया है| जबकि इस बारे में देश के लोगों को जानने का पूरा-पूरा हक है|

7. बाबा रामदेव और अन्ना हजारे कितने गॉंधीवादी और अहिंसा के कितने समर्थक हैं? हजारे ने अनशन शुरू करने से पूर्व गॉंधी की समाधि पर जाकर मथ्था टेका और स्वयं को गॉंधीवादी कहकर अनशन की शुरूआत की, लेकिन स्वयं अन्ना की उपस्थिति में अनशन मंच से अल्पसंख्यकों को विरुद्ध बाबा रामदेव के हरियाणा के कार्यकर्ता हिंसापूर्ण भाषणबाजी करते रहे| जिस पर स्वयं अन्ना हजारे को भी तालियॉं बजाते और खुश होते हुए देखा गया| यही नहीं अनशन समाप्त करने के बाद हजारे ने आजाद भारत के इतिहास के सबसे कुख्यात गुजरात के मुख्यमन्त्री नरेन्द्र मोदी को देश का सर्वश्रेृष्ठ मुख्यमन्त्री घोषित कर दिया| अब यह देशवासियों को समझना होगा कि बाबा रामदेव और आधुनिक गॉंधी अन्ना हजारे कितने गॉंधीवादी और अहिंसा समर्थक हैं?

8. एनजीओ और उद्योगपतियों के काले कारनामों और भ्रष्टाचार के बारे में भी एक शब्द नहीं बोला : अन्ना हजारे ने सेवा के नाम पर विदेशों से अरबों का दान लेकर डकार जाने वाले और देश को बेचने वाले कथित समाजसेवी संगठनों (एनजीओज्) के बारे में एक शब्द भी नहीं बोला, सरकारी बैंकों का अस्सी प्रतिशत धन हजम कर जाने वाले भारत के उद्योगपतियों के काले कारनामों और भ्रष्टाचार के बारे में भी एक शब्द नहीं बोला! आखिर क्यों? क्योंकि इन्हीं सबके मार्फत तो अन्ना के अनशन एवं सारे तामझाम का खर्च वहन किया जा रहा था|

9. अन्ना की मानसिक स्थिति-‘‘देश का आम मतदाता सौ रुपये में और दारू की एक बोतल में बिक जाता है|’’ स्वयं अन्ना हजारे अपनी अप्रत्याशित सफलता के कारण केवल दिल्ली से महाराष्ट्र रवाना होने से पूर्व आम मतदाता को गाली देने से भी नहीं चूके| संवाददाताओं को अन्ना ने साफ शब्दों में कहा कि ‘‘देश का आम मतदाता सौ रुपये में और दारू की एक बोतल में बिक जाता है|’’ अब अन्ना को ये कौन समझाये कि मतदाता ऐसे बिकने को तैयार होता तो संसद में आम लोगों के बीच के नहीं, बल्कि अन्ना के करीब मुम्बई में रहने वाले उद्योगपति बैठे होते| अन्ना जी आम मतदाता को गाली मत दो, आम मतदाता ही भारत और स्वयं आपकी असली ताकत हैं| इस बात से अन्ना की मानसिक स्थिति समझी जा सकती है!

10. लोकपाल कौन होगा? ऐसे हालात में सबसे बड़ा सवाल तो ये है कि हजारे के प्रस्तावित जन लोकपाल बिल को यदि संसद पास कर भी देती है, तो इस सबसे शक्ति सम्पन्न संवैधानिक संस्था का मुखिया अर्थात् लोकपाल कौन होगा? क्योंकि जिस प्रकार का जन-लोकपाल बिल ड्राफ्ट बनाये जाने का प्रस्ताव है, उसके अनुसार तो लोकपाल इस देश की कार्यपालिका, न्यायपालिका और व्यवस्थापिका से भी सर्वोच्च होगा| उसके नियन्त्रणाधीन केन्द्रीय एवं सभी राज्य सरकारें भी होगी और वह अन्तिम और बाध्यकारी निर्णय लेकर लागू करने में सक्षम होगा| बाबा राम देव तो लोकपाल को सुप्रीम कोर्ट के समकक्ष दर्जा देने की मांग कर रहे हैं|

11. भ्रष्ट, चालाक और मानसिक रूप से रुग्ण व्यक्ति के लोकपाल बनने की सम्भावना को पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता : ऐसे में देश के सवा सौ करोड़ लोगों की ओर से मेरा सीधा सवाल यह है कि यदि गलती से इस (लोकपाल) पद पर कोई भ्रष्ट, चालाक और मानसिक रूप से रुग्ण व्यक्ति आ गया तो..? आने की सम्भावना को पूरी तरह से नकारा भी नहीं जा सकता है| इतिहास के पन्ने पटलकर देखें तो पायेंगे कि जब संविधान बनाया गया था तो किसने सोचा होगा कि पण्डित सुखराम, ए. राजा, मस्जिद ध्वंसक लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, संविधान निर्माता डॉ. अम्बेड़कर को गाली देने वाले अरुण शौरी जैसे लोग भी मन्त्री के रूप में संविधान की शपथ लेकर माननीय हो जायेंगे? जब सीवीसी अर्थात् मुख्य सतर्कता आयुक्त बनाया गया था तो किसी ने सोचा होगा कि इस पथ पर एक दिन दागी थॉमस की भी नियुक्ति होगी? किसी ने सोचा होगा कि मुख्यमन्त्री के पद पर बैठकर नरेन्द्र मोदी गुजरात में कत्लेआम करायेंगे? जिससे पूरे संसार के समक्ष भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि तहस-नहस हो जायेगी? ऐसे हालातों में हमें हजारे जी कैसे विश्‍वास दिलायेंगे कि जितने भी व्यक्ति आगे चलकर प्रस्तावित जन लोकपाल के शक्ति-सम्पन्न पद पर बिराजमान होंगे, वे बिना पूर्वाग्रह के पूर्ण-सत्यनिष्ठा और ईमानदारी के साथ राष्ट्रहित में अपने कर्त्तव्यों का निर्वाह करेंगे| विशेषकर तब जबकि जन लोकपाल का बिल ड्राफ्ट बनाने वाली समित के लिये हजारे जी को अपनी ओर से मनवांछित और पूर्व घोषित पैमाने पर खरा उतरने वाला एक अराजनैतिक एवं निश्कलंक छवि का यक्ति नहीं मिल सका!

इसलिये जन लोकपाल बिल का ड्राफ्ट बनाने वाली समिति को प्रस्तावित जन लोकपाल को नियन्त्रित करने की व्यवस्था भी, बिल में ही करनी चाहिये| अन्यथा कहीं ऐसा न हो कि इस देश के सभी संवैधानिक निकायों पर नियन्त्रण करने वाला लोकपाल स्वयं अधिनायक बन जाये और भारत की लोकतान्त्रिक विरासत मिट्टी में मिल जाये और, या ऐसा शक्ति-सम्पन्न कोई भी व्यक्ति उन सभी से अधिक भ्रष्ट हो जाये, जिन भ्रष्टों के भ्रष्टाचार की रोकथाम के पवित्र उद्देश्य से हजारे और देशवासियों द्वारा उसे बनाया और रचा जा रहा है? विशेषकर तब जबकि थॉमस के मामले में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष भारत सरकार की ओर से यह कहा जा चुका है कि पूरी तरह से निर्विवाद और निश्कलंक छवि का व्यक्ति ढूँढना आसान नहीं है!

लेखक डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’, जयपुर से प्रकाशित हिन्दी पाक्षिक समाचार-पत्र “प्रेसपालिका” के सम्पादक, विविध विषयों के लेखक, टिप्पणीकार, चिन्तक, शोधार्थी तथा समाज एवं प्रशासन में व्याप्त नाइंसाफी, भेदभाव, शोषण, भ्रष्टाचार, अत्याचार, मनमानी, मिलावट, गैर-बराबरी आदि के विरुद्ध 1993 में स्थापित एवं 1994 से राष्ट्रीय स्तर पर दिल्ली से पंजीबद्ध राष्ट्रीय संगठन “भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान” (बास) (BAAS) के मुख्य संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं। जिसके हजारों आजीवन कार्यकर्ता (4751) राजस्थान के सभी जिलों एवं देश के आधे से अधिक राज्यों में सेवारत हैं। राष्ट्रीय अध्यक्ष : ऑल इण्डिया ट्राईबल रेलवे एम्पलाईज एसोसिएशन, पूर्व राष्ट्रीय महासचिव : अजा एवं अजजा संगठनों का अखिल भारतीय परिसंघ|
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ये है हमारे देश का धार्मिक चरित्र-दलित रिटायर हुआ तो रूम को गोमूत्र से धोया!

Dr. Purushottam meena 'Nirankush'

Writer/लेखक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

केरल तिरूअनंतपुर से एक खास खबर है, कि ‘‘दलित रिटायर हुआ तो रूम को गोमूत्र से धोया’’ जिसे इलेक्ट्रोनिक मीडिया और प्रिण्ट मीडिया ने दबा दिया और इसे प्रमुखता से प्रकाशित या प्रसारित करने लायक ही नहीं समझा| कारण कोई भी समझ सकता है| मीडिया बिकाऊ और ऐसी खबरों को ही महत्व देता है, जो उसके हितों के अनुकूल हों| दलितों के अपमान की खबर के प्रकाशन या प्रसारण से मीडिया को क्या मिलने वाला है? इसलिये मीडिया ने इसे दबा दिया या बहुत ही हल्के से प्रकाशित या प्रसारित करके अपने फर्ज की अदायगी करली, लेकिन यह मामला दबने वाला नहीं है| खबर क्या है पाठक स्वयं पढकर समझें|

खबर यह है कि देश के सामाजिक दृष्टि से पिछड़े माने जाने वाले राज्यों में किसी दलित अधिकारी का अपमान हो जाए तो यह लोगों को चौंकाता नहीं है, लेकिन सबसे शिक्षित और विकसित केरल राज्य में ऐसा होना हैरान करता है| यह सोचने को विवश करता है कि सर्वाधिक शिक्षित राज्य के लोगों को प्रदान की गयी शिक्षा कितनी सही है?

खबर है कि केरल राज्य के तिरूअनंतपुरम में एक दलित अधिकारी के सेवानिवृत्त होने के बाद उसकी जगह आए उच्च जातीय अधिकारी ने उसके कक्ष और फर्नीचर को शुद्ध करने के लिए गोमूत्र का छिड़काव करवाया| दलित वर्ग के ए. के. रामकृष्णन 31 मार्च को पंजीयन महानिदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुए थे| उन्होंने उक्त बातों का पता लगने पर मानव अधिकार आयोग को लिखी अपनी शिकायत में कहा है कि उनके पूर्ववर्ती कार्यालय के कुछ कर्मचारियों ने मेज, कुर्सी और यहां तक कि कार्यालय की कार के अंदर गोमूत्र छिड़का है| इस घटना की जांच की मांग करते हुए उन्होंने मानव अधिकार आयोग का दरवाजा खटखटाया है|

रामकृष्णन ने कहा कि ‘‘कार्यालय और कार का शुद्धिकरण इसलिए किया गया, क्योंकि वह अनुसूचित जाति (दलित वर्ग) से हैं और यह उच्च जातीय व्यक्ति द्वारा जानबूझकर किया गया उनके मानव अधिकार एवं नागरिक स्वतंत्रता के अधिकारों का खुला उल्लंघन है|’’

दलित वर्ग के ए. के. रामकृष्णन की याचिका के आधार पर मानव अधिकार आयोग ने मामला दर्ज कर राज्य सरकार के कर-सचिव को नोटिस भेजा है| इसका जवाब सात मई तक देना है|

दलित वर्ग के ए. के. रामकृष्णन का कहना है कि ‘‘मैं इस मामले को सिर्फ व्यक्तिगत अपमान के तौर पर नहीं ले रहा हूँ| यह सामाजिक रूप से वंचित समूचे तबके का अपमान है| यदि एक सरकारी विभाग में शीर्ष पद पर बैठे व्यक्ति को इस तरह की स्थिति का सामना करना पड़ सकता है तो निचले पायदान पर रहने वाले आम लोगों की क्या हालत होगी?’’ उन्होंने बताया कि ‘‘पंजीयन महानिदेशक के पर पर पिछले पांच साल का उनका अनुभव बहुत खराब रहा है|’’

इस मामले में सबसे बड़ा और अहम सवाल तो यह है कि नये पदस्थ उच्च जातीय अधिकारी को गौ-मूत्र ये कार्यालय की सफाई करने के लिये कितना जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? क्योंकि उन्होंने तो वही किया तो उन्हें उसके धर्म-उपदेशकों ने सिखाया या उन्हें जो संस्कार प्रदान किये गये| ऐसे में केवल ऐसे अधिकारी के खिलाफ जॉंच करने, नोटिस देने या उसे दोषी पाये जाने पर दण्डित करने या सजा देने से भी बात बनने वाली नहीं है|

सबसे बड़ी जरूरत तो उस कुसंस्कृति, रुग्ण मानसिकता एवं मानव-मानव में भेद पैदा करने वाली धर्म-नीति को प्रतिबन्धित करने की है, जो गौ-मूत्र को दलित से अधिक पवित्र मानना सिखाती है और गौ-मूत्र के जरिये सम्पूर्ण दलित वर्ग को अपमानित करने में अपने आप को सर्वोच्च मानती है| इस प्रकार की नीति को रोके बिना कोई भी राज्य कितना भी शिक्षित क्यों न हो, अशिक्षित, हिंसक और अमानवीय लोगों का आदिम राज्य ही कहलायेगा|

लेखक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’ जयपुर से प्रकाशित हिन्दी पाक्षिक समाचार-पत्र “प्रेसपालिका” (PRESSPALIKA) के सम्पादक, विविध विषयों के लेखक, टिप्पणीकार, चिन्तक, शोधार्थी तथा समाज एवं प्रशासन में व्याप्त नाइंसाफी, भेदभाव, शोषण, भ्रष्टाचार, अत्याचार, मनमानी, मिलावट, गैर-बराबरी आदि के विरुद्ध 1993 में स्थापित एवं 1994 से राष्ट्रीय स्तर पर दिल्ली से पंजीबद्ध राष्ट्रीय संगठन “भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान” (बास) (BAAS) के मुख्य संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं। जिसके हजारों आजीवन कार्यकर्ता (4747) राजस्थान के सभी जिलों एवं देश के आधे से अधिक राज्यों में सेवारत हैं। राष्ट्रीय अध्यक्ष : ऑल इण्डिया ट्राईबल रेलवे एम्पलाईज एसोसिएशन, पूर्व राष्ट्रीय महासचिव : अजा एवं अजजा संगठनों का अखिल भारतीय परिसंघ, dr.purushottammeena@yahoo.in Ph. 0141-2222225 Mob. : 098285-02666
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यह कैसा न्याय? अपराध सिद्ध फिर भी सजा नहीं!

Dr. Purushottam meena 'Nirankush'

लेखक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

यह कैसा न्याय?
अपराध सिद्ध फिर भी सजा नहीं!
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इस बात को कोई साधारण पढालिखा या साधारण सी समझ रखने वाला व्यक्ति भी समझता है कि देश के खजाने को नुकसान पहुँचाने वाला व्यक्ति देशद्रोही से कम अपराधी नहीं हो सकता और उसके विरुद्ध कानून में किसी भी प्रकार के रहम की व्यवस्था नहीं होनी चाहिये, लेकिन जिन्दगीभर भ्रष्टाचार के जरिये करोडों का धन अर्जित करने वालों को सेवानिवृत्ति के बाद यदि 1/2 पेंशन रोक कर सजा देना ही न्याय है तो फिर इसे तो कोई भी सरकारी अफसर खुशी-खुशी स्वीकार कर लेगा।
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डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

पिछले दिनों दिल्ली हाई कोर्ट ने एक निर्णय सुनाया, जिसमें न्यायाधीश द्वय प्रदीप नंदराजोग तथा एमसी गर्ग की खण्डपीठ ने रक्षा मंत्रालय से वरिष्ठ लेखा अधिकारी पद से सेवानिवृत्त हो चुके एचएल गुलाटी की आधी पेंशन काटे जाने की बात कही गयी। गुलाटी भारत सरकार की सेवा करतु हुए 36 झूठे दावों के लिए भुगतान को मंजूरी देकर सरकारी खजाने को 42 लाख रुपये से भी अधिक की चपत लगायी थी। हाई कोर्ट ने भ्रष्टाचार का अपराध सिद्ध होने पर भी गुलाटी को जेल में डालने पर विचार तक नहीं किया और रक्षा मंत्रालय में रहकर भ्रष्ट आचरण करने वाले एचएल गुलाटी की 50 फीसदी पेंशन काटी जाने की सजा सुना दी।

हाई कोर्ट के इस निर्णय से भ्रष्टाचार को बढावा ही मिलेगा :

इस निर्णय को अनेक तथाकथित राष्ट्रीय कहलाने वाले समाचार-पत्रों और इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने अफसरों के लिये कोर्ट का कडा सन्देश कहकर प्रचारित किया। जबकि मेरा मानना है कि एक सिद्धदोष भ्रष्ट अपराधी के विरुद्ध हाई कोर्ट का इससे नरम रुख और क्या हो सकता था? मैं तो यहाँ तक कहना चाहूँगा कि हाई कोर्ट के इस निर्णय से भ्रष्टाचार पर लगाम लगने के बजाय भ्रष्टाचार को बढावा ही मिलेगा।

अनुशासनिक कार्यवाही के साथ-साथ दण्ड विधियों के तहत भी कार्यवाही :

प्रश्न यह नहीं है कि कोर्ट का रुख नरम है या कडा, बल्कि सबसे बडा सवाल तो यह है कि 42 लाख रुपये का गलत भुगतान करवाने वाले भ्रष्टाचारी के विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता के तहत मामला दर्ज करके दण्डात्मक कार्यवाही क्यों नहीं की गयी? और केवल विभागीय जाँच करके और विभागीय नियमों के तहत की जाने वाली अनुशासनिक कार्यवाही की औपचरिकता पूर्ण करके मामले की फायल बन्द क्यों कर दी गयी? जबकि विभागीय कानून में स्पष्ट प्रावधान है कि लोक सेवकों द्वारा किये जाने वाले अपराधों के लिये अनुशासनिक कार्यवाही के साथ-साथ दण्ड विधियों के तहत भी कार्यवाही की जा सकती है या की जानी चाहिये।

कार्यवाही की जा सकती है या की जानी चाहिये शब्दावली भी समस्या की असल जड और 99 फीसदी समस्याओं के मूल कारण आईएएस :

इन कानूनों में-कार्यवाही की जा सकती है या की जानी चाहिये शब्दावली भी समस्या की असल जड है! इसके स्थान पर विभागीय अनुशासनिक कार्यवाही के साथ-साथ दण्ड विधियों के तहत भी कार्यवाही की जायेगी और ऐसा नहीं करने पर जिम्मेदार उच्च लोक सेवक या विभागाध्यक्ष के विरुद्ध भी कार्यवाही होगी। ऐसा कानूनी प्रावधान क्यों नहीं है? जवाब भी बहुत साफ है, क्योंकि कानून बनाने वाले वही लोग हैं, जिनको ऐसा प्रावधान लागू करना होता है। ऐसे में कौन अपने गले में फांसी का फन्दा बनाकर डालना चाहेगा? कहने को तो भारत में लोकतन्त्र है और जनता द्वारा निर्वाचित सांसद, संसद मिलबैठकर कानून बनाते हैं, लेकिन- संसद के समक्ष पेश किये जाने वाले कानूनों की संरचना भारतीय प्रशासनिक सेवा के उत्पाद महामानवों द्वारा की जाती हैं। जो स्वयं ही प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इस देश की 99 फीसदी समस्याओं के मूल कारण हैं।

जनता को कारावास और जनता के नौकरों की मात्र निंदा :
विचारणीय विषय है कि एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को गाली-गलोंच और मारपीट करता है तो आरोपी के विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता के तहत अपराध बनाता है और ऐसे आरोपी के विरुद्ध मुकदमा दर्ज होने पर पुलिस जाँच करती है। मजिस्ट्रेट के समक्ष खुली अदालत में मामले का विचारण होता है और अपराध सिद्ध होने पर कारावास की सजा होती है, जबकि इसक विपरीत एक अधिकारी द्वारा अपने कार्यालय के किसी सहकर्मी के विरुद्ध यदि यही अपराध किया जाता है तो उच्च पदस्थ अधिकारी या विभागाध्यक्ष ऐसे आरोपी के खिलाफ पुलिस में मामला दर्ज नहीं करवाकर स्वयं ही अपने विभाग के अनुशासनिक नियमों के तहत कार्यवाही करते हैं। जिसके तहत आमतौर पर चेतावनी, उसके कृत्य की भर्त्सना (निंदा) किये जाने आदि का दण्ड दिया जाता है और मामले को रफा-दफा कर दिया जाता है।

विभागाध्यक्ष भी तो अपराध कारित करते रहते हैं :
इस प्रकार के प्रकरणों में प्रताड़ित या व्यथित व्यक्ति (पक्षकार) की कमी के कारण भी अपराधी लोक सेवक कानूनी सजा से बच जाता है, क्योंकि व्यथित व्यक्ति स्वयं भी चाहे तो मुकदमा दायर कर सकता है, लेकिन अपनी नौकरी को खतरा होने की सम्भावना के चलते वह ऐसा नहीं करता है। लेकिन यदि विभागाध्यक्ष द्वारा मुकदमा दायर करवाया जाये तो विभागाध्यक्ष की नौकरी को तो किसी प्रकार का खतरा नहीं हो सकता, लेकिन विभागाध्यक्ष द्वारा पुलिस में प्रकरण दर्ज नहीं करवाया जाता है। जिसकी भी वजह होती है-स्वयं विभागाध्यक्ष भी तो आये दिन इस प्रकार के अपराध कारित करते हुए ही अपने विभाग में अपने अधिनस्थों पर आतंक को कायम रख पाते हैं। जिसके चलते मनमानी व्यवस्था संचालित होती है, जो कानूनों के विरद्ध कार्य करवाकर भ्रष्टाचार को अंजाम देने के लिये जरूरी होता है।

विभागीय जाँच के नाम पर सुरक्षा कवच :
किसी भी सरकारी विभाग में किसी महिलाकर्मी के साथ छेडछाड या यौन-उत्पीडन करने, सरकारी धन का दुरुपयोग करने, भ्रष्टाचार करने, रिश्वत मांगने आदि मामलों में भी इसी प्रकार की अनुशासनिक कार्यवाही होती है, जबकि इसी प्रकार के अपराध आम व्यक्ति द्वारा किये जाने पर, उन्हें जेल की हवा खानी पडती है। ऐसे में यह साफ तौर पर प्रमाणित हो जाता है कि जनता की सेवा करने के लिये, जनता के धन से, जनता के नौकर के रूप में नियुक्ति सरकारी अधिकारी या कर्मचारी, नौकरी लगते ही जनता और कानून से उच्च हो जाते हैं। उन्हें आम जनता की तरह सजा नहीं दी जाती, बल्कि उन्हें विभागीय जाँच के नाम पर सुरक्षा कवच उपलब्ध करवाया दिया जाता है।

विभागीय जाँच का असली मकसद अपराधी को बचाना :

जबकि विधि के इतिहास में जाकर गहराई से और निष्पक्षतापूर्वक देखा जाये तो प्रारम्भ में विभागीय जाँच की अवधारणा केवल उन मामलों के लिये स्वीकार की गयी थी, जिनमें कार्यालयीन (ओफिसियल) कार्य को अंजाम देने के दौरान लापरवाही करने, बार-बार गलतियाँ करने और कार्य को समय पर निष्पादित नहीं करने जैसे दुराचरण के जिम्मेदार लोक सेवकों को छोटी-मोटी शास्ती देकर सुधारा जा सके, लेकिन कालान्तर में लोक सेवकों के सभी प्रकार के कुकृत्यों को केवल दुराचरण मानकर विभागीय जाँच का नाटकर करके, उन्हें बचाने की व्यवस्था लागू कर दी गयी। जिसकी ओट में सजा देने का केवल नाटक भर किया जाता है, विभागीय जाँच का असली मकसद अपराधी को बचाना होता है।

खजाने को नुकसान पहुँचाने वाला देशद्रोही से कम नहीं :

इस बात को कोई साधारण पढालिखा या साधारण सी समझ रखने वाला व्यक्ति भी समझता है कि देश के खजाने को नुकसान पहुँचाने वाला व्यक्ति देशद्रोही से कम अपराधी नहीं हो सकता और उसके विरुद्ध कानून में किसी भी प्रकार के रहम की व्यवस्था नहीं होनी चाहिये, लेकिन जिन्दगीभर भ्रष्टाचार के जरिये करोडों का धन अर्जित करने वालों को सेवानिवृत्ति के बाद यदि 1/2 पेंशन रोक कर सजा देना ही न्याय है तो फिर इसे तो कोई भी सरकारी अफसर खुशी-खुशी स्वीकार कर लेगा।

उम्र कैद की सजा का अपराध करके भी अपराधी नहीं :

दिल्ली हाई कोर्ट के इस निर्णय से 42 लाख रुपये के गलत भुगतान का अपराधी सिद्ध होने पर भी गुलाटी न तो चुनाव लडने या मतदान करने से वंचित होगा और न हीं वह कानून के अनुसार अपराधी सिद्ध हो सका है। उसे केवल दुराचरण का दोषी ठहराया गया है। जबकि ऐसे भ्रष्ट व्यक्ति के विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता की धारा 409 के अनुसार आपराधिक न्यासभंग का मामला बनता है, जिसमें अपराध सिद्ध होने पर आजीवन कारावास तक की सजा का कडा प्रावधान किया गया है। फिर प्रश्न वही खडा हो जाता है कि इस कानून के तहत मुकदमा कौन दर्ज करे?
जब तक कानून की शब्दावली में-ऐसा किया जा सकता है! किया जाना चाहिये! आदि शब्द कायम हैं कोई कुछ नहीं कर सकता! जिस व्यक्ति ने 36 मामलों में गलत भुगतान करवाया और सरकारी खजाने को 42 लाख की क्षति कारित की, उसके पीछे उसका कोई पवित्र ध्येय तो रहा नहीं होगा, बल्कि 42 लाख में से हिस्सेदारी तय होने के बाद ही भुगतान किया गया होगा। जो सीधे तौर पर सरकारी धन, जो लोक सेवकों के पास जनता की अमानत होता है। उस अमान की खयानत करने का मामला बनता है, जिसकी सजा उक्त धारा 409 के तहत अपराधी को मिलनी ही चाहिये।

कोर्ट को स्वयं संज्ञान लेकर आपराधिक मामले दर्ज करने के आदेश देने चाहिये :

मेरा तो स्पष्ट मामना है कि जैसे ही कोर्ट के समक्ष ऐसे प्रकरण आयें, कोर्ट को स्वयं संज्ञान लेकर अपराधी के साथ-साथ सक्षम उच्च अधिकारी या विभागाध्यक्ष के विरुद्ध भी आपराधिक मामले दर्ज करने के आदेश देने चाहिये, जिससे ऐसे मामलों में स्वत: ही प्रारम्भिक स्तर पर ही पुलिस में मामले दर्ज होने शुरू हो जायें और अपराधी विभागीय जाँच की आड में सजा से बच कर नहीं निकल सकें। इसके लिये आमजन को आगे आना होगा और संसद को भी इस प्रकार का कानून बनाने के लिये बाध्य करना होगा। अन्यथा गुलाटी जैसे भ्रष्टाचारी जनता के धन को इसी तरह से लूटते रहेंगे और सरेआम बचकर इसी भांति निकलते भी रहेंगे।

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बीमारियों का प्रकोप, कैसे बचें?

Dr. Purushottam meena 'Nirankush'

लेखक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’
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वैसे तो होम्योपैथी में रोगी के लक्षणों को देखकर के दवा का चयन किया जाता है, लेकिन मेरा करीब 20 वर्ष का अनुभव है कि आईफ्लू में हर रोगी के 90 प्रतिशत लक्षण एक समान पाये जाते हैं। जिनके लिये मेरी ओर से हर बार एक ही दवाई लोगों को मुफ्त में बाँटी जाती है। जिसका नाम है-यूफ्रेसिया-30 पोटेंसी में 4-5 पिल्स दिन में 4 बार रोगी को चूसने को देने पर 24 घण्टे में आराम मिल जाता है।

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इन दिनों देशभर में बुखार और आईफ्लू के बीमार देखे जा सकते हैं। बीमारी नियन्त्रित नहीं हो रही हैं। महंगे उपचार के बाद भी रोगी मारे भी जा रही हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिस मार्डन ऐलोपैथी पर हम पूरी तरह से निर्भर हैं, वह कितनी सही और निरामय है।

यह बात निर्विवाद सत्य है कि ऐलोपैथिक चिकित्सा पद्धति जिसे आधुनिक या मॉडर्न चिकित्सा पद्धपि भी कहा जाता है की लगभग शतप्रतिशत दवाईयों का मानव पर उपयोग करने से पूर्व मूक जानवरों पर परीक्षण किया जाता है। जिसके चलते दवाईयों के शारीरिक प्रभाव एवं कुप्रभाव तो नोट कर लिये जाते हैं, लेकिन इनके मानव मन पर क्या-क्या कुप्रभाव होते हैं। इसका कोई परीक्षण या परिणाम पता नहीं चल पाता है। इसलिये ऐलोपैथिक दवाईयों से रोगियों में अनेक प्रकार की मनोविकृतियाँ पैदा हो जाती हैं। जिनके उपचार के लिये फिर से नयी दवाईयाँ दी जाती हैं और यह सिलसिला मृत्युपर्यन्त चलता रहता है।

इन दिनों भारत जैसे देशों में विदेशी कम्पनियों को अपनी दवाईयों के मरीजों पर क्लीनिकल परीक्षण की अनुमतियाँ प्रदान की जाने लगी हैं। जिनके कारण अनेक गरीब और निर्दोष लोगों की मौत तक हो जाती हैं। भारत के लोग चुप बैठे तमाशा देखते रहते हैं। यह सब भारत की आईएएस लॉबी की कभी न समाप्त होने वाली धनलिप्सा के कारण सम्भव हो पा रहा है।

इसके अलावा भारतीय चिकित्सा पद्धतियों के भारत में ही लगातार पिछडते जाने का मूल कारण है, केन्द्रीय स्वास्थ्य मन्त्रालय में नीतिनियन्ता पद पर (चिकित्सा महानिदेशक के पद पर) केवल और केवल ऐलोपैथ चिकित्सकों का काबिज होना, जो कभी नहीं चाहते कि आयुर्वेद या होम्योपैथी या अन्य निरामय चिकित्सा पद्धतियाँ प्रभावी हों। इन पैथियों के विकास, उत्थान, अनुसन्धान आदि पर कितना बजट खर्च करना है, इसका निर्धारण एक ऐलोपैथ तय करता है।

इस दिशा में हम आम लोगों और मीडिया की चुप्पी भी बडा कारण है। इसके चलते अन्य पैथियों को उतना बजट नहीं मिल पाता है, जितना जरूरी है, इसका दु:खद दुष्परिणाम यह होता है कि आयुर्वेद के वैद्य भी स्वयं को डॉक्टर लिखने/कहलवाने और ऐलोपैथिक दवाईयों का उपयोग करने में पीछे नहीं रहते हैं। जबकि उन्हें ऐलोपैथी की दवाईयों का उपयोग करने का कानूनी अधिकार नहीं होता है।

इन दिनों देशभर में आईफ्लू फैला हुआ है, जिससे एक ओर तो चश्मों की विक्री हो रही है, दूसरी ओर आईड्रॉप भी खूब बिक रहे हैं। परिवार में किसी को भी यह तकलीफ हो गयी तो आम तौर पर परिवार के सभी सदस्यों में इसका संक्रमण हो जाता है। इसके बावजूद भी ऐलोपैथिक पद्धति में इसकी रोकथाम के लिये कोई टीका ईजाद नहीं किया गया है।

यदि किसी बन्धु को यह पीडा हो तो होम्योपैथी में इसका बडा ही आसान और सरल उपचार है। वैसे तो होम्योपैथी में रोगी के लक्षणों को देखकर के दवा का चयन किया जाता है, लेकिन मेरा करीब 20 वर्ष का अनुभव है कि आईफ्लू में हर रोगी के 90 प्रतिशत लक्षण एक समान पाये जाते हैं। जिनके लिये मेरी ओर से हर बार एक ही दवाई लोगों को मुफ्त में बाँटी जाती है। जिसका नाम है-यूफ्रेसिया-30 पोटेंसी में 4-5 पिल्स दिन में 4 बार रोगी को चूसने को देने पर 24 घण्टे में आराम मिल जाता है।

जिन लोगों को तकलीफ नहीं है, यदि वे भी इसकी दो दिन में चार खुराकों का सेवन कर लें तो उनका इस तकलीफ से बचाव हो जाता है। मेरा अनुभव है कि यह 90 से 95 फीसदी मामलों में सफल रही है। फिर भी योग्य होम्योपैथ की राय लेना उचित होगा।

इसी प्रकार से देशभर में इन दिनों अनेक प्रकार के बुखार चल रहे हैं, जिन्हें अनेक नामों से पुकारा जा रहा है। जिनमें अनेक लोगों की मृत्यु भी हो रही है। इलाज के नाम पर लूट भी खूब हो रही है। पिछले 20 दिनों में मेरे परिवार के चार सदस्यों को भी बुखार ने जकड लिया था। होम्योपैथी की दवाईयों के उपयोग से सभी स्वस्थ हो चुके हैं। जबकि अनेक हमारे परिचित एक माह से भी अधिक समय से एलोपैथों के चक्कर में बेहाल हैं।

कल समाचार मिला कि अजमेर में जिस बच्ची का पिछली वर्ष विवाह हुआ था, उसका जयपुर के एक प्रसिद्ध होस्पीटल में इलाज करवाया गया, तीन लाख रुपये खर्च हो गये और फिर भी कल 08.09.10 को लडकी की मृत्यु हो गयी।

मेरा पाठकों से आग्रह है कि ऐलोपैथी के जहर से बचें।

डिब्बाबन्द भोजन का उपयोग बन्द करें। शारीरिक श्रम करने में शर्म का अनुभव नहीं करें। प्रतिदिन हल्काफुल्का व्यायाम करें। भोजन में दाल, हरी सब्जी और ताजगी का खयाल रखें और जब कभी तकलीफ हो ही जाये तो कम से कम ऐलोपैथ के चक्कर में नहीं पडें और सबसे महत्वपूर्ण बात ये कि किसी भी होम्योपैथ या आयुर्वेद के वैद्य पर तब तक विश्वास नहीं करें, जब तक कि आपको उसके ज्ञान एवं अनुभव की सही एवं विश्वसनीय जानकारी नहीं हो, क्योंकि आजकल नकली आयुर्वेदाचार्य और होम्योपैथ भी कम नहीं है।

इसी प्रकार से ऐलोपैथी का ज्ञान नहीं रखने वाले किसी वैद्य या होम्योपैथ से कभी भी ऐलोपैथिक दवाईयाँ नहीं लें। अन्यथा जीवन को खतरे से निकालना असम्भव है!

-लेखक होम्योपैथ चिकित्सक, मानव व्यवहारशास्त्री, दाम्पत्य विवादों के सलाहकार, विविध विषयों के लेखक, टिप्पणीकार, कवि, शायर, चिन्तक, शोधार्थी, तनाव मुक्त जीवन, लोगों से काम लेने की कला, सकारात्मक जीवन पद्धति आदि विषय के व्याख्याता तथा समाज एवं प्रशासन में व्याप्त नाइंसाफी, भेदभाव, शोषण, भ्रष्टाचार, अत्याचार और गैर-बराबरी आदि के विरुद्ध 1993 में स्थापित एवं 1994 से राष्ट्रीय स्तर पर दिल्ली से पंजीबद्ध राष्ट्रीय संगठन-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) के मुख्य संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं। जिसमें 13 सितम्बर, 2010 तक, 4463 रजिस्टर्ड आजीवन कार्यकर्ता देश के 17 राज्यों में सेवारत हैं। फोन नं. 0141-2222225 (सायं 7 से 8 बजे)

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भाजपा को नहीं, भारत को बचाना है!

भाजपा को नहीं, भारत को बचाना है!

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

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इस समय भाजपा अपने अस्तित्व के लिये संघर्ष कर रही है। इसलिये अब हम भारतीयों को चाहिये कि धर्म का मुखौटा पहनकर देश को तोडने वाली भाजपा, संघ, विश्व हिन्दू परिषद आदि के नाटकीय बहकावे में नहीं आना है और मुसलमानों को इनके उकसावे में आकर अपना धैर्य नहीं खोना है। अन्यथा ये धर्मविरोधी संगठन 24 सितम्बर को इस देश के सौहार्द को बिगाडने में कोई कोर कसर नहीं छोडेंगे। विश्वास करें, इनके साथ केवल देश के 1 प्रतिशत लोग भी नहीं हैं। शेष लोगों को तो ये मूर्ख बनाकर साम्प्रदायिकता की आग में झोंकरकर अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं! अत: हमें भाजपा को नहीं, बल्कि हर हाल में भारत को और भारतीयों को बचाना है।

Dr. Purushottam meena 'Nirankush'

लेखक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

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जब-जब भी और जहाँ-जहाँ पर भी भारतीय जनता पार्टी की सरकार सत्ता में रही हैं। उसके नेतृत्व ने देश और समाज को मूर्ख बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोडी है। केवल इतना ही नहीं, इनके गुर्गे (मन्त्री भी) जो संघ एवं विश्वहिन्दू परिषद से आदेश प्राप्त करते हैं, हिन्दुत्व के नाम पर हिन्दू समाज की पिछडी और छोटी जाति के लोगों को मुसमानों के सामने करके अपनी लडाई लडते रहते हैं, जबकि मोदी, तोगड़िया और आडवाणी जैसे तो वातानुकूलित कमरों में आराम फरमाते रहते हैं। इस बात को तो देश-विदेश के सभी लोग जानते हैं कि गुजरात में हिन्दुओं के हाथों मुसलमानों का कत्लेआम करवाया गया, लेकिन इस बात को बहुत कम लोग जानते हैं कि जिन हिन्दुओं के हाथों मुसलमानों का कत्लेआम करवाया गया, वे कौन थे और उनकी वर्तमान दशा क्या है? गुजरात के दूर-दराज के क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी एवं पिछडी जाति के लोगों के घरों में स्वयं भगवा ब्रिगेड के लोगों द्वारा आग लगाई गयी थी। अनेकों हिन्दुओं को इस आग के हवाले कर दिया गया और बतलाया गया कि मुसलमानों ने हिन्दुओं को जला दिया है। जिससे आक्रोशित होकर इन भोले-भाले अशिक्षित हिन्दुओं ने अनेक निर्दोष मुसलमानों के घरों में आग लगा दी। अनेकों को मौत के घाट उतार दिया। आज ये गरीब और बहकावे में आने वाले आदिवासी हिन्दू या तो जेल में बन्द हैं या जमानत मिलने के बाद कोर्ट में पेशियाँ दर पेशियाँ भुगतते फिर रहे हैं। इन्हें हिन्दुत्व के नाम पर मुसलमानों के विरुद्ध भडकाने वाले कहीं दूर-दूर तक नजर नहीं आते हैं। हिन्दुत्व के नाम पर संघ शाखाओं में हाथियारों के संचालन का प्रशिक्षण प्रदान करके सरेआम आतंकवाद को बढावा दिया जा रहा है। तोगड़िया त्रिशूल और भाला बांट रहे हैं। संघ से जुडे अनेक लोग अनेक आतंकवादी घटनाओं में पकडे जा चुके हैं। जिन्हें बचाने के लिये संघ एवं भाजवा वाले इसे सोनिया सरकार की चाल बतला रहे हैं। बस यात्रा के बहाने पाकिस्तान से दोस्ती का नाटक खेलने वाले पूर्व प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी की अदूरदर्शिता एवं देश विरोधी नीति के चलते हजारों सैनिकों को कारगिल में मरवा दिया। हजारों सैनिकों को हमारी ही धरती पर मारगिराने वाले पाकिस्तानियों को वापस पाकिस्तान में सुरक्षित चले जाने की लिये वाजपेयी सरकार ने वाकायदा सेना को चुप रहने एवं पाकिस्तानियों पर आक्रमण नहीं करने का आदेश दिया था। इसके बाद लम्बे समय तक आर-पास की लडाई की बात का नाटक करके हिमालय की ऊँची बर्फीली की चोटियो पर हमारे सैनिकों को तैनात करके अनेक सैनिकों को बेमौत गल-गल कर मर जाने को विवश कर दिया। इसके बाद भी भाजपा, संघ और विहिप द्वारा बेशर्मी से प्रचारित किया गया कि वाजपेयी के नेतृत्व में भारत ने कारगिल में पाकिस्तान पर विजय प्राप्त की। इसी प्रकार से हजारों करोड डालरों से भरे बक्सों के साथ कन्धार में दुर्दान्त आतंकियों को छोडकर आने वाले वाजपेयी सरकार के विदेश मन्त्री जसवन्त सिंह को जिन्ना का गुणगान करने पर पहले तो बाहर का रास्ता दिखा दिया, लेकिन जैसे ही पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह शैखावत का निधन हुआ तो राजपूत वोटों को लुभाने के लिये बिना शर्त वापस बुला लिया गया। मध्य प्रदेश के मुख्यमन्त्री हर साल पांच सितम्बर को शिक्षकों के पैर पखारते (धोते) हैं और इस बात का नाटक करते हैं कि भाजपा के राज में गुरुओं का सर्वाधिक सम्मान होता है। जबकि सच्चाई को जानना है तो गत शिक्षक दिवस से ठीक पूर्व वेतन नहीं मिलने के चलते शिक्षक की मौत के लिये जिम्मेदार मध्य प्रदेश के मुख्यमन्त्री की असली तस्वीर को ब्लॉग लेखक श्री अजीत ठाकुर के निम्न समाचार से समझा जा सकता है। “होशंगाबाद जिले की पिपरिया तहसील के ग्राम मटकुली में एक व्यक्ति की मौत हो गई। ये कोई साधारण मौत नहीं है, ये मौत करारा तमाचा है, हमारे शिक्षातंत्र पर और हमारी व्यवस्था की भयानकतम असंवेदनशीलता का नमूना, ये एक शिक्षक की मौत है। चार महीने से वेतन नहीं मिल पाने की वजह से बीमार सहायक अध्यापक हरिकिशन ठाकुर ने बेहतर इलाज के अभाव में दम तोड दिया। इनकी मौत के 6 दिन बाद ही इनका परिवार भूखे मरने की नौबत में है। ये उस देश में हुआ है, जहाँ गुरु को गोविन्द से बडा बताया गया है, जहाँ पर एक दिन अर्थात् 5 सितम्बर शिक्षक दिवस शिक्षको को समर्पित है। ये उस प्रदेश में हुआ जहाँ के माननीय मुख्यमंत्री जी (शिवराज सिंह चौहान) शिक्षक दिवस पर शिक्षको के पैर धोकर उनका सम्मान करते हैं। इस असंवेदनहीन व्यवस्था में हम कैसे किसी द्रोण या चाणक्य (के पैदा होने) की उम्मीद कर सकते हैं और जब द्रोण और चाणक्य नहीं होंगे तो अर्जुन और चन्द्रगुप्त की उम्मीद तो बेमानी है।” केवल इतना ही नहीं देश के लोगों को इस बात को भी ठीक से समझ लेना चाहिये कि- कश्मीर की वर्तमान दु:खद स्थिति के लिये भी प्राथमिक तौर पर ये ही कथित हिन्दुत्ववादी आतंकी ताकतें ही हर प्रकार से जिम्मेदार हैं। तत्कालीन कश्मीर पर पाकिस्तानी हमले के लिये भी इन्हीं के विचार जिम्मेदार थे। इन ताकतों को इस बात से बखूबी पहचाना जा सकता है कि पहले तो इन्होने भारत में कश्मीर के विलय का ही विरोध किया था और तत्कालीन कश्मीर सरकार पर नेहरू के कूटनीतिक दबाव कारण विलय सम्भव हो भी गया तो इनको विलय का तरीका ही नहीं सुहाया और कश्मीर में साम्प्रदायिकता की नफरत का बीज बोने के लिये इनके नेताओं ने तरह-तरह के नाटक किये गये। जिनके कारण कश्मीर से हजारों पण्डित बेघर हो गये और इस पर भी तुर्रा ये कि ये अपने आपको राष्ट्रवादी कहते हैं। अखण्ड भारत की बात करते हैं। देश को तोडने के लिये कुटिल चालें चलने में माहिर ये अनीश्वरवादी हिन्दुत्व के ठेकेदार, ईश्वर के नाम पर 1947 से भारत के भोले-भाले हिन्दुओं को लगातार बहकाने और उकसाने के अपराध में संलिप्त हैं। भाजपा की पूर्व मुख्यमन्त्री वसुन्धरा राजे ने राजस्थान में शराब, शबाब और जमीन बेचकर भ्रष्टाचार को बढावा देने में कोई कोर-कसर नहीं छोडी थी और राजस्थान को कई दशक पीछे धकेल दिया। हर राज्य में इनकी करनी और कथनी में धरती आसमान का अन्तर स्पष्ट नजर आता है। इनका एक मात्र कार्य है किसी भी प्रकार से समाज में अमन-शान्ति और भाईचारा बिगडा रहे, जिससे ये अपनी राजनीति की रोटियाँ सेकते रहें। यह है असली चेहरा-भाजपा और संघ के संस्कृति और राष्ट्रवादी चरित्र का। अब जबकि 24 सितम्बर को अयोध्या-बाबरी भूमि विवाद पर मालिकाना हक का निर्णय सुनाये जाने की तारीख घोषित हो चुकी है तो भाजपा, आरएसएस एवं विश्व हिन्दू परिषद तथा इनके अनुसांगिक संगठनों की ओर से हिन्दुत्व के नाम पर समाज को साम्प्रदायिकता की आग में धकेलने की पूरी तैयारी शुरू की जा चुकी है। मोबाईल पर मैसेज के जरिये लोगों को उद्वेलित करके भडाया जा रहा है और जैसे ही मौका मिलेगा, ये देश के माहौल को बिगाडने के लिये कुछ भी करने को तैयार बैठे हैं। जबकि आम लोगों को इस बात का ज्ञान ही नहीं है कि भाजपा एवं इसके समर्थक जिस हिन्दुत्व को मानते हैं, उसमें ईश्वर को ही नकारा गया है। इनके आदर्श हैं सावरकर जो ईश्वर की सत्ता में कतई भी विश्वास नहीं करते, तब ही तो इनके लिये निरीह गाँधी का वध गर्व की बात है। इस समय भाजपा अपने अस्तित्व के लिये संघर्ष कर रही है। इसलिये अब हम भारतीयों को चाहिये कि धर्म का मुखौटा पहनकर देश को तोडने वाली भाजपा, संघ, विश्व हिन्दू परिषद आदि के नाटकीय बहकावे में नहीं आना है और मुसलमानों को इनके उकसावे में आकर अपना धैर्य नहीं खोना है। अन्यथा ये धर्मविरोधी संगठन 24 सितम्बर को इस देश के सौहार्द को बिगाडने में कोई कोर कसर नहीं छोडेंगे। विश्वास करें, इनके साथ केवल देश के 1 प्रतिशत लोग भी नहीं हैं। शेष लोगों को तो ये मूर्ख बनाकर साम्प्रदायिकता की आग में झोंकरकर अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं! अत: हमें भाजपा को नहीं, बल्कि हर हाल में भारत को और भारतीयों को बचाना है।

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