बीमारियों का प्रकोप, कैसे बचें?

Dr. Purushottam meena 'Nirankush'

लेखक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’
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वैसे तो होम्योपैथी में रोगी के लक्षणों को देखकर के दवा का चयन किया जाता है, लेकिन मेरा करीब 20 वर्ष का अनुभव है कि आईफ्लू में हर रोगी के 90 प्रतिशत लक्षण एक समान पाये जाते हैं। जिनके लिये मेरी ओर से हर बार एक ही दवाई लोगों को मुफ्त में बाँटी जाती है। जिसका नाम है-यूफ्रेसिया-30 पोटेंसी में 4-5 पिल्स दिन में 4 बार रोगी को चूसने को देने पर 24 घण्टे में आराम मिल जाता है।

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इन दिनों देशभर में बुखार और आईफ्लू के बीमार देखे जा सकते हैं। बीमारी नियन्त्रित नहीं हो रही हैं। महंगे उपचार के बाद भी रोगी मारे भी जा रही हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिस मार्डन ऐलोपैथी पर हम पूरी तरह से निर्भर हैं, वह कितनी सही और निरामय है।

यह बात निर्विवाद सत्य है कि ऐलोपैथिक चिकित्सा पद्धति जिसे आधुनिक या मॉडर्न चिकित्सा पद्धपि भी कहा जाता है की लगभग शतप्रतिशत दवाईयों का मानव पर उपयोग करने से पूर्व मूक जानवरों पर परीक्षण किया जाता है। जिसके चलते दवाईयों के शारीरिक प्रभाव एवं कुप्रभाव तो नोट कर लिये जाते हैं, लेकिन इनके मानव मन पर क्या-क्या कुप्रभाव होते हैं। इसका कोई परीक्षण या परिणाम पता नहीं चल पाता है। इसलिये ऐलोपैथिक दवाईयों से रोगियों में अनेक प्रकार की मनोविकृतियाँ पैदा हो जाती हैं। जिनके उपचार के लिये फिर से नयी दवाईयाँ दी जाती हैं और यह सिलसिला मृत्युपर्यन्त चलता रहता है।

इन दिनों भारत जैसे देशों में विदेशी कम्पनियों को अपनी दवाईयों के मरीजों पर क्लीनिकल परीक्षण की अनुमतियाँ प्रदान की जाने लगी हैं। जिनके कारण अनेक गरीब और निर्दोष लोगों की मौत तक हो जाती हैं। भारत के लोग चुप बैठे तमाशा देखते रहते हैं। यह सब भारत की आईएएस लॉबी की कभी न समाप्त होने वाली धनलिप्सा के कारण सम्भव हो पा रहा है।

इसके अलावा भारतीय चिकित्सा पद्धतियों के भारत में ही लगातार पिछडते जाने का मूल कारण है, केन्द्रीय स्वास्थ्य मन्त्रालय में नीतिनियन्ता पद पर (चिकित्सा महानिदेशक के पद पर) केवल और केवल ऐलोपैथ चिकित्सकों का काबिज होना, जो कभी नहीं चाहते कि आयुर्वेद या होम्योपैथी या अन्य निरामय चिकित्सा पद्धतियाँ प्रभावी हों। इन पैथियों के विकास, उत्थान, अनुसन्धान आदि पर कितना बजट खर्च करना है, इसका निर्धारण एक ऐलोपैथ तय करता है।

इस दिशा में हम आम लोगों और मीडिया की चुप्पी भी बडा कारण है। इसके चलते अन्य पैथियों को उतना बजट नहीं मिल पाता है, जितना जरूरी है, इसका दु:खद दुष्परिणाम यह होता है कि आयुर्वेद के वैद्य भी स्वयं को डॉक्टर लिखने/कहलवाने और ऐलोपैथिक दवाईयों का उपयोग करने में पीछे नहीं रहते हैं। जबकि उन्हें ऐलोपैथी की दवाईयों का उपयोग करने का कानूनी अधिकार नहीं होता है।

इन दिनों देशभर में आईफ्लू फैला हुआ है, जिससे एक ओर तो चश्मों की विक्री हो रही है, दूसरी ओर आईड्रॉप भी खूब बिक रहे हैं। परिवार में किसी को भी यह तकलीफ हो गयी तो आम तौर पर परिवार के सभी सदस्यों में इसका संक्रमण हो जाता है। इसके बावजूद भी ऐलोपैथिक पद्धति में इसकी रोकथाम के लिये कोई टीका ईजाद नहीं किया गया है।

यदि किसी बन्धु को यह पीडा हो तो होम्योपैथी में इसका बडा ही आसान और सरल उपचार है। वैसे तो होम्योपैथी में रोगी के लक्षणों को देखकर के दवा का चयन किया जाता है, लेकिन मेरा करीब 20 वर्ष का अनुभव है कि आईफ्लू में हर रोगी के 90 प्रतिशत लक्षण एक समान पाये जाते हैं। जिनके लिये मेरी ओर से हर बार एक ही दवाई लोगों को मुफ्त में बाँटी जाती है। जिसका नाम है-यूफ्रेसिया-30 पोटेंसी में 4-5 पिल्स दिन में 4 बार रोगी को चूसने को देने पर 24 घण्टे में आराम मिल जाता है।

जिन लोगों को तकलीफ नहीं है, यदि वे भी इसकी दो दिन में चार खुराकों का सेवन कर लें तो उनका इस तकलीफ से बचाव हो जाता है। मेरा अनुभव है कि यह 90 से 95 फीसदी मामलों में सफल रही है। फिर भी योग्य होम्योपैथ की राय लेना उचित होगा।

इसी प्रकार से देशभर में इन दिनों अनेक प्रकार के बुखार चल रहे हैं, जिन्हें अनेक नामों से पुकारा जा रहा है। जिनमें अनेक लोगों की मृत्यु भी हो रही है। इलाज के नाम पर लूट भी खूब हो रही है। पिछले 20 दिनों में मेरे परिवार के चार सदस्यों को भी बुखार ने जकड लिया था। होम्योपैथी की दवाईयों के उपयोग से सभी स्वस्थ हो चुके हैं। जबकि अनेक हमारे परिचित एक माह से भी अधिक समय से एलोपैथों के चक्कर में बेहाल हैं।

कल समाचार मिला कि अजमेर में जिस बच्ची का पिछली वर्ष विवाह हुआ था, उसका जयपुर के एक प्रसिद्ध होस्पीटल में इलाज करवाया गया, तीन लाख रुपये खर्च हो गये और फिर भी कल 08.09.10 को लडकी की मृत्यु हो गयी।

मेरा पाठकों से आग्रह है कि ऐलोपैथी के जहर से बचें।

डिब्बाबन्द भोजन का उपयोग बन्द करें। शारीरिक श्रम करने में शर्म का अनुभव नहीं करें। प्रतिदिन हल्काफुल्का व्यायाम करें। भोजन में दाल, हरी सब्जी और ताजगी का खयाल रखें और जब कभी तकलीफ हो ही जाये तो कम से कम ऐलोपैथ के चक्कर में नहीं पडें और सबसे महत्वपूर्ण बात ये कि किसी भी होम्योपैथ या आयुर्वेद के वैद्य पर तब तक विश्वास नहीं करें, जब तक कि आपको उसके ज्ञान एवं अनुभव की सही एवं विश्वसनीय जानकारी नहीं हो, क्योंकि आजकल नकली आयुर्वेदाचार्य और होम्योपैथ भी कम नहीं है।

इसी प्रकार से ऐलोपैथी का ज्ञान नहीं रखने वाले किसी वैद्य या होम्योपैथ से कभी भी ऐलोपैथिक दवाईयाँ नहीं लें। अन्यथा जीवन को खतरे से निकालना असम्भव है!

-लेखक होम्योपैथ चिकित्सक, मानव व्यवहारशास्त्री, दाम्पत्य विवादों के सलाहकार, विविध विषयों के लेखक, टिप्पणीकार, कवि, शायर, चिन्तक, शोधार्थी, तनाव मुक्त जीवन, लोगों से काम लेने की कला, सकारात्मक जीवन पद्धति आदि विषय के व्याख्याता तथा समाज एवं प्रशासन में व्याप्त नाइंसाफी, भेदभाव, शोषण, भ्रष्टाचार, अत्याचार और गैर-बराबरी आदि के विरुद्ध 1993 में स्थापित एवं 1994 से राष्ट्रीय स्तर पर दिल्ली से पंजीबद्ध राष्ट्रीय संगठन-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) के मुख्य संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं। जिसमें 13 सितम्बर, 2010 तक, 4463 रजिस्टर्ड आजीवन कार्यकर्ता देश के 17 राज्यों में सेवारत हैं। फोन नं. 0141-2222225 (सायं 7 से 8 बजे)

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